Tuesday, 6 June 2023

घर

 

झलक दिख जाती है तब 

जब डूबने से बच कर

ऊपर आता है कोई 

अन्यथा नीचे तो बस लाशें है

जीवित तो कोई नहीं


स्मरण आ जाता है तब 

जब नींद को दूर कर

ऊपर आता है कोई 

अन्यथा नीचे तो बस स्वप्न है

जागृत तो कोई नहीं


कुचक्र टूट जाता है तब 

जब हवाओ को चीरकर

ऊपर आता है कोई

अन्यथा नीचे तो सभी लाचार है

पुरुष तो कोई नहीं


अर्थ मिल जाता है तब

जब चल चित्र में चलते हुए

घर पहुंच जाता है कोई

अन्यथा नीचे तो बस मेला है

बिकता है जहाँ हर कोइ

Wednesday, 31 May 2023

आत्मघात



                                                                
कीमत क्या है ऐसे रिश्तो की

जो जुड़े है कल्पनाओ से

दूसरों को दिखाकर खुद को छिपाना 

क्या मिलेगा दौड़ते रहने से?

कीमत क्या है ऐसे रिश्तो की

जो जनमते है वासनाओ से

दूसरों को लुभाकर खुद को भुलाना 

क्या मिलेगा दौड़ते रहने से?








कीमत क्या है ऐसे रिश्तो की

जो जीवित रहते है बाज़ार से

दूसरों को लूटकर खुद को लुटाना 

क्या मिलेगा दौड़ते रहने से?

कीमत यही है ऐसे रिश्तो की 

जो खोखले कर जाते है अंदर से

बस बिखरते रहना और दौड़ते जाना 

जीवन को जलाना अपने ही हाथों से

भीतर ही समाधान

 किसने मिट्टी में प्राण फैलाया

मै हूँ कौन और कहा से आया 

जन्म क्यों किस लिए ये पाया 

मै बाहर रहकर समझ न पाया




किसने ताल पे किसे नचाया

हँसा कौन और कौन रुलाया 

पास होकर दूरी मै देख न पाया 

मै बाहर रहकर समझ न पाया


किसका हृदय मैंने क्यों जलाया

तृष्णा में खुद को क्यों भुलाया

काल से देखो बचा न कुछ पाया

मै बाहर रहकर समझ न पाया


विवेक ने जब अज्ञान जलाया 

मै और मेरा का मैल मिटाया

शून्य में एकत्व का ठौर पाया

हर तरफ दिखा साहब का साया

अर्ज़ी

 चाहे सूरज की पहली किरण

या स्वेत बादलो की छटा बनकर

चाहे तारो की सजाओ सेज

और आ जाओ तुम चाँद बनकर

आओ देखो सड़ कर मर रहा इंसान

अज्ञान की संकुचित गलियों में गलकर


चाहे दीपक की लौ बनकर

या सन्नाटे में हवा का झोखा बनकर

चाहे बच्चे को लगाओ मार 

और आ जाओ तुम पिता बनकर

आओ देखो देखो सड़ कर मर रहा इंसान

अज्ञान की संकुचित गलियों में गलकर


मै चाहता हू बस की आओ 

जिससे हर आँख में तुम्हारा तेज

बल बनकर बहे इन बाहुओ में 

जिससे हर हृदय में तुम्हारा प्रेम

प्रेरणा बनकर बहे इन शब्दों में 

जिससे हर कान में तुम्हारा संगीत 

शांति बनकर बहे इस जीवन में 

जिससे हर प्राण तुमसे पूर्ण होकर

खेले इस संसार रुपी आँगन में

Friday, 5 May 2023

बुद्धत्व



मुझसे दूर यहाँ 
है सब जीवित खुद को कहते 
हर कोई न मालूम 
क्यों अधमरा सा रहता है

मुझसे दूर यहाँ 
है सब ज्ञानी खुद को कहते 
हर कोई न मालूम
क्यों डरा डरा सा रहता है

मुझसे दूर यहाँ 
है सब बलवान खुद को कहते 
हर कोई न मालूम
क्यों चलना भी नहीं जानता है

सिद्धार्थ होकर यहाँ 
है सब मुझको ही सबमे देखते 
तुम्हारा सिद्धार्थ न मालूम 
क्यों उठना भी नहीं चाहता है


घर

  झलक दिख जाती है तब  जब डूबने से बच कर ऊपर आता है कोई  अन्यथा नीचे तो बस लाशें है जीवित तो कोई नहीं स्मरण आ जाता है तब  जब नींद को दूर कर ऊ...